Sunday, 15 April 2018

सूर्य नगरी   :   जोधपुर 




नीली नगरी जोधपुर - पश्चिमी भारत के थार रेगिस्तान की सीमा पर बसा जोधपुर शहर सूर्य नगरी के नाम से विख्यात है। यह स्थान अपने किलों, महलों और उद्यानों से भारतीय एंव विदेशी सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित करता है।  सन्न 1459 में राठौर राजा रॉव जोधा ने इस नगरी की स्थापना की थी।  तब से अब तक इस शहर में कई  बदलाव आये किन्तु कभी भी इसकी संस्कृति एंव सभ्यता को कोई भी आँच नहीं आयी।  रणबाँके राठौर की इस भूमि की सदियों पुरानी परम्परा राजपूतों ने आज भी अपनी अगली पीढ़ी के लिए संजो कर रखी है।  "नीली नगरी" जोधपुर को  देखने के लिए हर वर्ष लाखों पर्यटक यहाँ पहुँचते हैं।



मेहरानगढ़ किला - 15वीं शताब्दी में निर्मित मेहरानगढ़ किला जोधपुर शहर से 125 मीटर की ऊँचाई पर एक टीले पर स्थित है। एक किदवंती के अनुसार मेवाड़ राजाओं के पास एक पहुँचे हुए संत बाबा भुक्खड़ चिड़ियानाथ आये थे और उन्होंने राजा को आदेश दिया कि इस स्थान पर एक किले का निर्माण किया जाए जो कि बाहर से आने वाली फोजों  से आपकी रक्षा करेगा। संत के कथनानुसार राजा ने यहाँ एक भव्य किले का निर्माण करवाया। नीचे  से किले तक पहुँचने के लिए पर्यटकों की सुविधा हेतू  एक पक्की सड़क है और एक लिफ्ट भी लगी हुई है।  किले में  पहुँचकर पर्यटक सबसे पहले दौलतखाने  मे प्रवेश करतें हैं। जहाँ  तामझाम ,रजतशाही ,पिंजसखासा आदि पालकियाँ रखी हुई हैं  जोकि रानियों एंव  राज कुमारो क आने-जाने के काम आती थी।  दूसरे कक्ष में मेवाड़ राजाओ द्वारा इस्तेमाल किये हुए अस्त्र शस्त्र पड़े  हैं तथा साथ ही एक कमरे में राजस्थान शैली की मिनियेचर पेंटिंग प्रदर्शित की गयी हैं।  किले के प्रथम तल पर शीश महल है जिसकी बाई और रानी का पूजा स्थल व् दायीं  तरफ नृत्य कक्ष है। इससे  ऊपर द्वितीय  तल में फूल महल व विश्राम स्थल है।   किले  की ऊपरी दीवार पर कुछ तोपें लगी हुई हैं जोकि 200-300 वर्ष पुरानी हैं। ऐतिहासिक  मेहरानगढ़ किला जोधपुर शहर  की जीवित शान के रुप में आज भी मजबूती  से अपने  देखने वाले सैलानियों के लिए खड़ा है
उमेद भवन पैलेस - जोधपुर शहर  से पूर्व की ओर  बना उमेद भवन पैलेस 20वीं  सदी  में निर्मित एक मात्र शाही  महल है।  सन 1929  में जोधपुर शहर में भयंकर अकाल पड़ा था। सब तरफ त्राही त्राही  मच गयी थी तब महाराजा उमेद  सिंह ने अपनी प्रजा को  काम उपलब्ध  कराने  के लिए इस महल का निर्माण कराया  था जोकि  16  वर्ष की अवधि  में पूरा हुआ।  सुनहरी पीले पत्थर से निर्मित इस महल का नक्शा अंग्रेज वास्तुकार कलिंगटन जैकब ने बनाया था।  आज महल का कुछ हिस्सा संग्रहालय और होटल के रूप में विकसित है व बाकी हिस्सा शाही परिवार का निजी निवास स्थान है।  शाही महल में प्रवेश करने के लिए एक बड़ा सा लोहे का गेट है जिस पर बड़े ही सुन्दर शब्दों में लिखा है " रणबांका राठौर " . शाही महल में प्रवेश करने पर पर्यटकों को सर्वप्रथम शाही उद्यान में लगे भाँति भाँति के फूल अपनी ओर आकर्षित करते हैं।  यह उद्यान 10 एकड़ से भी अधिक भूमि में फैला हुआ है।  महल के प्रथम कक्ष में रंगीन छाया चित्रों द्वारा महल के विभिन्न हिस्सों को दर्शाया गया हैं।  द्वितीय कक्ष में शाही परिवार को भेंट स्वरुप मिली अनोखी घड़ियों को प्रदर्शित किया गया है।  छोटी सी लॉबी को पार करने के पश्चात् पर्यटक तीसरे कक्ष में  प्रवेश करते हैं।  जहाँ काँच एंव बॉन चाइना से बनी कटलरी को प्रदर्शित किया गया है।  इन सभी शाही चीज़ों के बीच पर्यटक अपने आपको किसी शाही मेहमान से कम नहीं समझते।

जसवन्त थड़ा - मेहरानगढ़ किले से 2 किलोमीटर की दूरी पर  महाराजा जसवन्त सिंह द्वितीय की याद में सन्न 1899 में इस थड़े  का निर्माण कराया गया था। यह थड़ा अदभुत कारीगरी व नक्काशी से परिपूर्ण है।  थड़े के सामने  एक छोटा सा तालाब है जिसमे शाम के समय जसवन्त थड़े का प्रतिबिम्ब बहुत ही सुन्दर दिखाई  है।
मंडोर - मेवाड़ राज्य की  प्राचीन राजधानी मंडोर जोधपुर शहर से 6  किलोमीटर  की दूरी पर बसा है। स्थानीय निवासियों में  यह मंडोर उद्यान के नाम से भी विख्यात है।  उद्यान में राठौर राजा राव अजीत सिंह प्रथम एंव  जसवन्त सिंह प्रथम की मधुर स्मृति में लाल पत्थर से निर्मित छतरियाँ अपनी अद्भुत कारीगरी व् नक्काशी के लिए  प्रसिद्ध हैं। उद्यान के बाई तरफ बड़ी सी चट्टान पर हॉल ऑफ़ हिरों तराशी हुई है जिसमें हिन्दुओं के 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास है।  सर्वप्रथम यहाँ चट्टान पर राठाओं के कुल देवता भगवान गणेश की सूंदर मूर्ति उत्कृष्ट है।  उसके बाद चामुण्डा जी व महिषासुर मर्दानी की भव्य मूर्तियाँ तराशी हुई हैं।  उद्यान के कोने मे छोटा सा संग्रहालय है जहाँ मेवाड़ राजाओं की यादगार वस्तुएँ दर्शनार्थ रखी हुई हैं। बाग के दूसरे कोने में एक आधुनिक किन्तु छोटा सा अप्पू घर बच्चों के लिए स्थापित है।  जोधपुर वासी व पर्यटक दोनों ही इस उद्यान में आकर अपने आपको प्रफुल्लित महसूस करते हैं।  

कैसे पहुँचे -  जोधपुर देश के  सभी प्रमुख शहरों से रेल मार्ग द्वारा जुड़ा हुआ है। हवाई मार्ग द्वारा भी यहाँ पहुँचा जा सकता है। यह स्थान सम्पूर्ण राजस्थान से सड़क मार्ग द्वारा भी जुड़ा  हुआ है।  
शहर में घूमने के लिए टैक्सी, ऑटो व् जीप इत्यादि आसानी से  उपलब्ध हो जाते हैं।  
कहाँ ठहरें -  जोधपुर शहर में पर्यटकों के ठहरने के लिए हर बजट के होटल उपलब्ध हैं, जिनमे उमेद भवन पैलेस, अजीत भवन पैलेस, राजस्थान टूरिज्म का होटल घूमर,  होटल मरुधर इत्यादि उपलब्ध हैं।  
क्या खाएँ -  पर्यटक जोधपुर शहर की प्रमुख मिर्ची वड़ा व मेवाड़ कचौड़ी खाना कभी नहीं भूलते।  
क्या खरीदें -  नई सड़क, त्रिपोलिया, लक्कड़ बाजार व घण्टाघर शहर के मुख्य बाजार हैं जहाँ आप चमड़े से निर्मित वस्तुएँ ,पेंटिग, नक्काशी  मूर्तियाँ व् जोधपुरी लहंगा चोली खरीद सकते हैं।  
कब जाएँ - जोधपुर जाने का उत्तम समय नवम्बर - मार्च के  बीच है।  उस समय यहाँ का का अधिकतम तापमान 27 डिग्री व न्यूनतम तापमान 9 डिग्री के बीच रहता है।       

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Tuesday, 20 March 2018

           जहाँ  है रहस्यमयी कृष्णा बटर बॉल :  महाबलिपुरम 



समुद्र तट मन्दिर 

तमिलनाडू की राजधानी चेन्नई से लगभग 60 किमी. की दूरी पर छोटा सा शहर है, जिसे महाबलिपुरम के नाम से  जाना जाता है।  बंगाल की खाड़ी के समुन्द्र तट पर स्थित होने कारण यह स्थान बहुत ही मनोरम है। प्राचीन काल में मामल्लापुरम अर्थात महान योद्धाओं के क्षेत्र के नाम से विख्यात यह स्थान पल्लव राजाओं की राजधानी हुआ करता था । 7वीं 8वीं  शताब्दी में निर्मित यहाँ  की  शिल्पकला तथा पत्थरों को तराशकर बनाये गए यहाँ  के मन्दिर दक्षिण  भारतीय संस्कृति का  जीता जागता स्वरुप हैं। वर्षभर यहाँ देशी-विदेशी कलाप्रेमी पर्यटकों का मेला लगा रहता है।  समुन्द्र किनारे स्थित समुन्द्र तट मंदिर (sea shore temple) दक्षिण भारत  के सर्वोत्तम प्राचीन मंदिरों की श्रेणी में आता है। द्रविड़ वास्तुकला का नमूना पेश करता यह मन्दिर भगवान विष्णु एंव शिव को  समर्पित है।  मन्दिर से टकराती सागर की लहरें आत्मविभोर कर देती हैं। 

अर्जुन पेनांस 

अर्जुन पेनांस अर्थात गंगा अवतरण - दो विशाल शिलाओं से निर्मित इस शिलाखण्ड का आकर 27 मीटर x 13 मीटर है।  यहाँ तपस्या में लीन पाण्डव पुत्र अर्जुन तथा गंगा अवतरण को पत्थरों पर उकेरकर बड़े ही सुन्दर तरीके  से दर्शाया गया है।


पंच रथ मन्दिर 

पंच रथ मन्दिर - तट मन्दिर से कुछेक किमी. की दूरी पर पंच रथ मन्दिर पाँच पाण्डवों को समर्पित है।  कहा जाता है कि अज्ञातवास के समय द्रोपदी सहित पाँच पाण्डवों ने कुछ समय यहाँ व्यतीत किया था।  


कृष्णा बटर बॉल 

रहयस्यमयी कृष्णा बटर बॉल - सम्पूर्ण विश्व में अनेक ऐसे रहस्यमयी तथ्य हैं जो विज्ञान को चुनोती देते देखे जा सकते हैं।  इसी का एक उदाहरण महाबलिपुरम में देखा जा सकता है। 6 मीटर ऊँचा, 5 मीटर चौड़ा तथा लगभग 250 टन वजनी यह विशालकाय पत्थर 45 डिग्री के कोण पर हजारों वर्षों से ज्यों का त्यों टिका हुआ है। कृष्णा बटर बॉल के  नाम से विख्यात यह अजूबा भौतिक विज्ञान के ग्रेविटी नियमों का उल्लंघन करता  प्रतीत होता है। लोगों की आस्था है कि यह बॉल भगवान श्री कृष्ण  के सर्वोप्रिय भोग मक्खन के रूप में स्वर्ग से गिरी है। यह जानते हुए भी कि सन 1908 में तबके के गवर्नर आर्थर हेवीलॉक के आदेशानुसार 7 हाथियों द्वारा इस पत्थर को हिलाने की नाकाम कोशिश की गयी थी, यहाँ आये पर्यटक इसे हिलाने का प्रयास कर रोमांच का अनुभव करते हैं।  

लाइट हाउस से महाबलिपुरम  विहंगम दृश्य 

लाइट हाउस - समुद्री जहाजों का पथ निर्देशन करने  हेतू बनाये गए इस लाइट हाउस में  यात्री टिकट लेकर ऊपरी तल तक जा सकते हैं।  85 फ़ीट ऊँचे बने इस लाइट हाउस से सम्पूर्ण मामल्लापुरम शहर तथा मीलों फैले समुद्र का दृश्यावलोकन अति लुभावना लगता है। इतनी ऊँचाई से  देखने पर भय एंव रोमांच से शरीर आनन्दित हो उठता है। 


महाबलिपुरम बीच 

क्रोकोडाइल पार्क - महाबलिपुरम से 14 किमी. दूर चेन्नई महाबलिपुरम रोड पर स्थित है मद्रास क्रोकोडाइल बैंक। इसे 1976 में अमेरिका के  रोमुलस विटेकर तथा उनकी पत्नी ने स्थापित किया था। केवल 15 मगरमच्छों से शुरू हुए इस पार्क में आज विभिन्न प्रजातिओं के 5000 से भी अधिक मगरमच्छ संरक्षित हैं।  


दक्षिण भारतीय व्यंजन का लुत्फ़ 

महाबलिपुरम पहुँचने के लिए चेन्नई निकटतम हवाई  अड्डा है। जोकि यहाँ से 60 किमी. दूर है।  रेलमार्ग द्वारा पहुँचने वाले यात्रियों के लिए चेन्गलपटु रेलवे स्टेशन यहाँ से 29 किमी. की दूरी पर स्थित है।  किन्तु अपनी यात्रा को सबसे बेहतरीन एंव रोमांच से भरपूर बनाने के लिए पर्यटकों को ईस्ट कोस्ट रोड अर्थात ECR को ही चुनना चाहिए। बस अथवा निजी वाहन द्वारा समुद्र  के साथ-साथ  चलते हुए अपनी यात्रा को यादगार बनाया जा सकता  है।        










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Sunday, 18 March 2018

                      भगवान शिव को समर्पित : एलिफेंटा केव्स 

महादेव का त्रिमूर्ति स्वरूप 
मुंबई के गेटवे ऑफ़ इंडिया से लगभग 10 किमी. समुन्द्र के बीच छोटा किन्तु अत्यंत सुन्दर टापू है - धरापुरी, जिसे गुफाओं का टापू भी कहा जाता है। यह अलौकिक स्थान अरब सागर में स्थित है। पुर्तगालियों  ने पहली बार जब इस द्वीप को दूर से  देखा तो उन्हें हाथी अर्थात एलिफैंट की एक  विशाल मूर्ति  दृष्टिगोचर हुई। जिस  कारण उन्होंने इसे एलिफेंटा केव्स का  नाम दे  दिया। पहाड़ी को तराशकर बनाई गई इन गुफाओं को दो समूहों में बाँटा गया है।  एक समूह में पाँच हिंदू गुफाएँ तथा दूसरे समूह में दो बुद्धिस्ट गुफाएँ सम्मिलित हैं। हिन्दू गुफाओं  में भगवान सदाशिव की सुन्दर और विशाल प्रतिमायें बनी हुई हैं। माना जाता है कि इन्हें 5वीं से 8वीं शताब्दी में बनाया गया होगा। 
एलिफेंटा केव्स का विशाल हॉल 

गुफा में एक बड़ा हॉल है जिसमे भगवान शिव की विभिन्न मुद्राओं को मूर्तियों में तराशा गया है। एलिफेंटा केव्स का मुख्य आकर्षण कभी न भुलाई जा सकने वाली भगवान शिव की त्रिमूर्ति है।  जिसमें महादेव कैलाशपति की रचयिता, पालनकर्ता एंव संघारकर्ता की छवि प्रस्तुत की गयी है। यह विशाल मूर्ति 23-24 फ़ीट लंबी तथा 17 फ़ीट ऊँची है। इसके अलावा नटराज,अर्धनारेश्वर, शिव-पार्वती एंव रावण द्वारा कैलाश पर्वत को उठाने का  प्रयास करती प्रतिमाएँ सजीव चित्रण प्रस्तुत करती हैं।
लेखक अपने परिवार के साथ 

सन्न 1987 में यूनेस्को द्वारा एलिफेंटा गुफाओं को विश्व धरोहर घोषित कर दिया गया। जिससे यह गुफाएँ पूरे विश्व में प्रसिद्ध हो गयी। एलिफेंटा पहुँचने के लिए पर्यटकों को मुंबई के सुप्रसिद्ध गेटवे ऑफ़ इंडिया से हर एक-आध  घंटे में स्टीमर्स मिल जाते हैं। जिसमे आने जाने का किराया 180 रूपए है। लगभग 50 मिनट में स्टीमर समुन्द्र की लहरों के साथ अठखेलियाँ करता हुआ आपको वहाँ पहुँचा देता है।
विश्व धरोहर का प्रवेश द्वार 
तट से एलिफेंटा गुफाएँ लगभग आधा किलोमीटर दूर है। पर्यटक पैदल अथवा टॉय ट्रेन का लुत्फ़ उठाते हुए भी इन गुफाओं तक  पहुँच सकते हैं।  टॉय ट्रेन का लुत्फ़ उठाने के लिए मात्र 10 रूपए की टिकट खरीदनी होती है।  टॉय ट्रेन से उतरकर लगभग 110 सीढियाँ चढ़नी पढ़ती हैं। सीढियाँ चढ़ने में असमर्थ पर्यटकों को यहाँ पालकी उपलब्ध हो जाती है।
टॉय ट्रेन का लुत्फ़ उठाता छोटा सा पर्यटक 
सीढ़ियों के दोनों ओर आस-पास के गाँव वालों ने दुकानें सजाई हुई हैं जोकि उनकी जीविका का साधन है। इन अस्थाई दुकानों में सजे सुन्दर-सुन्दर स्मृति चिन्हों को पर्यटक यादगार के रूप में यहाँ से ले जाते हैं।  समुन्द्र के बीच स्थित होने  के कारण यहाँ की आबोहवा ने इस स्थान को  बेहतरीन पर्यटक स्थल बना दिया है। जनमान्यता है कि पाण्डवों ने इन गुफाओं का निर्माण अपने अज्ञातवास के दौरान किया था। यह स्थान तीर्थयात्री  एंव पर्यटक दोनों को ही अपनी ओर आकर्षित करता है।  


अरब सागर में तैरता जहाज 
गेटवे ऑफ़ इंडिया से उपलब्ध स्टीमर्स               



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Monday, 4 September 2017

 रहस्यमयी मन्दिर जहाँ नहीं टिक पाती छत :  शिकारी देवी

माँ शिकारी देवी मन्दिर 

सम्पूर्ण विश्व में देवात्मा हिमालय अपनी अपूर्व प्राकृतिक सुन्दरता के लिए विख्यात है। इसी हिमालय में स्थित देव भूमि हिमाचल में अनेकों ऐसे प्राकृतिक देव स्थल विद्यमान हैं जो स्वयं में कई रहस्य समेटे हुए हैं। ऐसा ही एक रहस्यमयी एंव अलौकिक देव स्थल है - माँ शिकारी देवी। महृषि मार्कण्डेय ने इस सुन्दर स्थान पर कई वर्षों  तप किया जिससे प्रसन्न होकर माँ यहीं विराजमान हो गयीं। प्राचीन मान्यता के अनुसार पाण्डव पुत्रों ने अपने बनवास काल में माँ को प्रसन्न करने हेतू यहाँ मंदिर का निर्माण किया था। मन्दिर तो बन गया किन्तु किसी कारणवश छत का निर्माण करने से पूर्व ही उन्हें यहाँ से पलायन करना पड़ा।  कहा जाता है कि तभी से देवी प्रकोप  के कारण यहाँ कई बार कोशिश करने के बावजूद छत निर्माण का कार्य सम्पन्न नहीं हो पाया। मन्दिर के आस-पास कई सराय निर्मित हैं,जिनपर छत बनाना आसान था किन्तु मंदिर पर छत बनने से पहले ही ढह जाने का सिलसिला हर बार जारी रहा।  शरद ऋतु में यह सम्पूर्ण क्षेत्र 10-15 फुट बर्फ से ढक जाता है। किन्तु यह माँ का चमत्कार ही है कि शिकारी देवी मन्दिर परिसर में बर्फ नहीं टिक पाती। विज्ञान भी आज तक इन चमत्कारों को चुनोती नहीं दे पाया।

प्राकृतिक सुन्दरता से परिपूर्ण क्षेत्र 

प्राचीन काल में अत्याधिक घना वन क्षेत्र होने के कारण शिकारी शिकार पर जाने से पूर्व माँ का आशीर्वाद लेना नहीं भूलते थे। उनका यह मानना था कि माँ का आशीर्वाद लेकर शिकार पर जाने से सफलता अवश्य मिलेगी। जिससे कालान्तर में मन्दिर में प्रतिस्थापित माँ दुर्गा का नाम शिकारी देवी पड़ गया। समुन्द्र तल से लगभग 11000 फुट की ऊँचाई पर शिकारी देवी का मन्दिर मंडी जिले में चौहार घाटी के एक उच्च शिखर पर स्थापित है।  माँ के इस छोटे से मंदिर में कई देवी-देवताओं की पाषाण  मूर्तियाँ स्थापित हैं। यहाँ आये भक्तजन बड़े ही श्रद्धाभाव से पूजार्चना कर माँ का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।


मन्दिर परिसर में पाषाण मूर्तियाँ 

काफी ऊँचाई पर स्थित होने के कारण  इस क्षेत्र को मंडी क्षेत्र का ताज भी कहा जाता है।  यहाँ से चारों ओर दृष्टि डालने पर ऐसा प्रतीत होता है कि मानो हम बादलों में विचरण कर रहे हों।  शिकारी देवी मंदिर पहुँचने के लिए तीर्थयात्रिओं एंव प्रकृति प्रेमिओं को सर्वप्रथम हिमाचल जिले के मंडी शहर पहुँचना पड़ता है।  मंडी शहर से बस अथवा निजी वाहन द्वारा चैल चौक, बगस्याड, थुनाग होते हुए 75 किमी. दूर जन्जैहली पहुँचा जाता है। जन्जैहली कस्बे से लगभग २ किमी. आगे बायीं ओर 8-10 सीढ़ियाँ नीचे उतरकर एक विशाल शिला दिखाई पड़ती है,जिसे पाण्डव शिला के नाम से जाना जाता है। इतनी विशाल एंव भारी भरकम शिला को हिलाने  का ख्याल भी दिल-दिमाग में नहीं लाया जा सकता। आपको जानकार हैरानी होगी कि आप अपने हाथ की सबसे छोटी ऊँगली से भी इसे हिला सकते हैं। स्थानीय निवासी इसे पवित्र शिला  मानते हैं।  

                                                               

पाण्डव शिला 

जन्जैहली छोटा किन्तु सुन्दर क़स्बा है। प्रकृति ने इस स्थान को अमूल्य सुन्दरता प्रदान की हुई है। यहाँ यात्रियों के ठहरने हेतू हिमाचल टूरिज्म का ट्रेकर हॉस्टल एंव निजी होटल हैं। जन्जैहली से शिकारी देवी तक  सम्पूर्ण मार्ग वन विभाग के अंतर्गत आता है।

रायगढ़ 

मार्ग अति संकरा होने के कारण केवल छोटे वाहन ही मंदिर तक जा पाते हैं।  वाहन पार्किंग से मंदिर प्रांगण तक लगभग 400 सीढ़ियाँ हैं,जिनके दोनों ओर जलपान एंव पूजन सामग्री की झोपड़ीनुमा दुकानें बनी हुई हैं। जो तीर्थयात्री एंव प्रकृतिप्रेमी यहाँ रात्रि विश्राम करना चाहें उनके लिए मन्दिर कमेटी द्वारा स्थायी धर्मशाला बनी हुई है।  साथ ही हिमाचल वन विभाग का विश्राम गृह भी स्थित है।  नवरात्री में यहाँ भक्तों का मेला लग जाता है।  इन दिनों भक्तजन दूर-दूर से यहाँ आकर माँ का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।               

शिकारी देवी मन्दिर इतिहास 

शिखर पर स्थित शिकारी देवी मंदिर 

माँ का आशीर्वाद प्राप्त करते हुए लेखक 



                       

मन्दिर कमेटी की सराय 


वन विभाग का विश्राम ग्रह 



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Sunday, 20 August 2017


   पाण्डवों को मिले थे यहाँ शिवजी के बूढ़े ब्राह्मण के रूप में दर्शन 

                                                              बूढ़ा केदार 


शिवलिंग पर उकेरी हुई  मूर्तियाँ 
हिन्दूजनमानस के सबसे प्रमुख अराध्य देव भगवान शिव शंकर हैं। देवाधिदेव कहलाने वाले भगवान आशुतोष परम पावन हिमालय के अनेक स्थानो पर प्राकृतिक रूप मे वास करते हैं। ऐसे ही अनेक स्थानों को मनुष्य द्वारा तीर्थस्थलों का रूप दिया गया है। प्रतिवर्ष अनगिनत श्रद्धालु भक्त भगवान शिव की आराधना करने के लिए इन पावन तीर्थों पर पहुँचते हैं। महाहिमालय के मध्य मे ऐसा ही एक परम पावन तीर्थस्थल है - बूढ़ा केदार। पुराणो मे वर्णित इस स्थान को वृद्ध केदारेश्वर बताया गया है। प्राचीन काल मे चार धाम की यात्रा पर जाने के लिए सड़क मार्ग उबलब्ध न होने के कारण तीर्थयात्री गंगौत्री से केदारनाथ बूढ़ा केदार होते हुए जाते थे। प्राकृतिक सुंदरता से परिपूर्ण यह स्थान तीर्थयात्रियों एंव पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। 
बाल गंगा एंव धर्म गंगा का संगम 
बाल गंगा एंव धर्म गंगा नामक दो दिव्य धाराओं के संगम पर बसा यह एक अत्यंत नैसर्गिक स्थान है। स्कन्द पुराण के केदार खंड के अनुसार जब पाँचों पाँडव पुत्र गौत्र हत्या के पाप से मुक्ति के लिए हिमालय के इस इस क्षेत्र मे भ्रमण कर रहे थे तब भगवान शिव शंकर ने उन्हे वृद्ध ब्राह्मण के रूप मे दर्शन दिये। दर्शन देने के उपरांत आशुतोष भगवान शिला मे अन्तर्ध्यान हो गए। भगवान शंकर के पाँडवों को वृद्ध रूप मे दर्शन देने के कारण यह स्थान बूढ़ा केदार कहलाया। गाँव के मध्य मे स्थित छोटा सा यह मंदिर अत्यंत पूज्यनीय है। 
विशाल शिवलिंग 
मंदिर के गर्भ गृह मे ग्रेनाइट पत्थर की एक काली शिला है। इस विशाल पाषाण पर भगवान शिव,नंदी जी,पाँचों पांडव पुत्र आदि विभिन्न देवी देवताओं के चित्र अंकित किए गए हैं। समीप ही एक विशाल त्रिशूल विराजित है। भक्तजन इस विशाल शिला पर जल,फूल,बिल्व पत्र इत्यादि चढ़ाकर पूजार्चना करते हैं। यहाँ श्रावण मास मे शिव भक्त कावड़ियों का मेला लगा रहता है। माघ एंव श्रावण मास मे यहाँ रुद्राभिषेक एंव कथा का आयोजन होता है। दूर-दूर से श्रद्धालु भक्त इन भक्ति कार्यक्रमों मे भाग लेने के लिए बूढ़ा केदार पहुँचते हैं। बूढ़ा केदार के इस  मंदिर मे नाथ सम्प्रदाय के पुजारियों द्वारा पूजार्चना की जाती है।
बूढ़ा केदार मन्दिर 
बूढ़ा केदार का यह क्षेत्र न केवल धार्मिक दृष्टि से अपितु पर्यटन की दृष्टि से भी सभी को अपनी ओर आकर्षित करता है। यहीं से पर्यटक मसर ताल एंव सहस्त्र ताल नामक सुरमई झीलों पर जाने हेतू पैदल यात्रा आरम्भ करते हैं। प्रकृति प्रेमी एंव पथारोहण के अभिलाषी प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण इस मार्ग का रोमांचक आनंद उठाते हैं।
हिमालय एक भू स्वर्ग 
भूस्वर्ग का एहसास कराता यह सम्पूर्ण क्षेत्र तीर्थयात्रियों एंव पर्यटकों दोनों को ही समान रूप से अपनी ओर आकर्षित करता है। बूढ़ा केदार के इस सुरमई क्षेत्र मे पहुँचने के लिए तीर्थयात्रियों को हरिद्वार से लगभग 140       किमी. दूर घनसाली नामक स्थान पर पहुँचना होता है। घनसाली से लगभग 30 किमी. की दूरी पर स्थित है पवित्र बूढ़ा केदार गाँव।         

बूढ़ा केदार गाँव की प्राकृतिक सुन्दरता 
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Thursday, 10 August 2017

 भविष्य में होगी जहाँ बद्रीविशाल की पूजा : भविष्य बद्री 


भविष्य बद्री मन्दिर 
गढ़वाल हिमालय की गगनचुंबी हिम शृंखलाओं के मध्य अनेक ऐसे तीर्थस्थल विद्यमान हैं जहाँ पहुँच पाने की अभिलाषा मानव मस्तिष्क मे चिरकाल से जन्म लेती आई है। अनादिकाल से आर्य भूमि भारतवर्ष अनेक चमत्कारों एंव अवतारों से अविभूत होती आई है। इस महान भूमि पर अनेकों ऐसे रहस्यमयी तीर्थस्थल हैं जिनकी जानकारी आम मनुष्य के लिए अभी भी विस्मय एंव आश्चर्य का विषय है। जोशीमठ के समीप ऐसा ही एक रहस्यमयी तीर्थ है भविष्यबद्री। कहा जाता है कि जोशीमठ स्थित नृसिंह भगवान मन्दिर में शालीग्राम नृसिंह भगवान्  की एक भुजा दिन प्रतिदिन पतली हो रही है। हमारे आदि देव ग्रंथों के अनुसार जब यह भुजा टूटकर मूर्ति से अलग हो जाएगी उस समय नर-नारायण पर्वतों के आपस मे जुड़ जाने से बद्रीनाथ को जाने वाला मार्ग अगम्य हो जाएगा, तब तपोवन स्थित भविष्य बद्री मे भगवान बद्री नारायण की पूजा की जायेगी। 
तपोवन 
जोशीमठ से 15 किमी. दूर मलेरी जाने वाले मार्ग पर स्थित है तपोवन। धवल ताल से निकली धोली गंगा के तट पर शांतपूर्ण वातावरण मे बसे तपोवन से पवित्र द्रोणागिरी पर्वत के दर्शन तीर्थयात्रियों को प्राप्त होते हैं। 
गर्म जल के स्रोत (तपोवन)
तपोवन मे सड़क मार्ग के किनारे ही गर्म जल के अनेक स्रोत हैं, जिनसे  निकलने वाला गर्म पानी तीर्थयात्रियों एंव सैलानियों के लिए जिज्ञासा का विषय बना हुआ है। तपोवन मे रहने के लिए छोटे-छोटे होटलों के अलावा एक ऋषिकुल आश्रम की व्यवस्था भी है,किन्तु प्रायः भविष्य बद्री की ओर जाने वाले यात्री तपोवन से 4 किमी. दूर सलधार मे बने एक आश्रम मे ही रुकना पसन्द करते हैं।
सलधार गाँव 
सलधार गाँव के बीच स्थित इस छोटे से आश्रम के समीप बिखरे अनुपम सौंदर्य का रसपान केवल भाग्यशाली व्यक्तियों को ही हो पाता है। आश्रम का शान्त एकान्त वातावरण तीर्थयात्रियों को एक अलौकिक एंव आनन्दमयी मानसिक शांति प्रदान करता है। प्राकृतिक हरियाली के बीच आश्रम के सामने अडिग ध्यानावस्थित अवस्था मे स्थित दुग्ध धवल हिम छिन्द्ति पवित्र द्रोणागिरी पर्वत की चोटी तीर्थयात्रियों का मन मोह लेती है।
 द्रोणागिरी पर्वत 
आश्रम के चारों ओर फैली हरियाली एंव प्रकृति की अछूती सुषमा निहारकर तीर्थयात्रियों का चित भाव विभोर हो जाता है। द्रोणागिरी पर्वत के आस पास बसे कई गावों मे हनुमान जी की पूजा नहीं की जाती। इन गावों के निवासियों का मानना है कि श्री राम रावण युद्ध मे लक्ष्मण जी के मूर्छित होने  पर हनुमान जी द्रोणागिरी पर्वत का एक हिस्सा ही ले गए थे। यदि उन्हे संजीवनी बूटी की आवश्यकता थी तो केवल बूटी ही ले जाते। पर्वत का एक हिस्सा ले जाने के कारण यहाँ के निवासी हनुमान जी से रुष्ट हो गए,तभी से यहाँ हनुमान जी की पूजा न करने का विधान है। आज द्रोणागिरी पर्वत का एक हिस्सा अपने स्थान पर नहीं है जोकि इस कथा को सत्य प्रमाणित करता है। सलधार से लगभग 6 किमी. की खड़ी चड़ाई द्वारा भविष्य बद्री पहुँचा जाता है। चलने मे असमर्थ यात्रियो को एक दिन पूर्व ही गाँव मे घोड़ो की व्यवस्था कर लेनी चाहिए। जिससे  अगले दिन यात्रा पर निकलने मे असुविधा ना हो। पैदल जाने वाले तीर्थयात्री लगभग 3 घंटे मे भविष्य बद्री पहुँच जाते हैं। ऊबड़ खाबड़ एंव कटीली घास वाले मार्ग से होते हुए तीर्थयात्री यात्री आगे बढ़ते हैं। यहाँ से सुभई गाँव की दूरी लगभग 4किमी. है किन्तु यहाँ से आगे का सम्पूर्ण मार्ग खड़ी चड़ाई वाला होने के कारण यात्रियो को सावधानीपूर्वक चलना पड़ता है। समुन्द्र तल से लगभग नौ हजार फीट की ऊँचाई पर घने वृक्षों के बीच बद्रीनाथ का छोटा सा मंदिर स्थित है। एक छोटे से चबूतरे पर बना यह मंदिर अपने आप मे रहस्यपूर्ण है। 
शिला पर उभरती विष्णु भगवन की मूर्ति 
मंदिर के भीतर एक शिला पर नरसिंह भगवान की शेर के धड़ वाली आकृति स्वयं ही उभर रही है। जनमान्यता के अनुसार जिस दिन ये मूर्ति सम्पूर्ण हो जाएगी तब बद्रीनाथ जाने वाला मार्ग बंद हो जाएगा जिस कारण भक्तों को बद्री विशाल की पूजा हेतू इस स्थान पर आना होगा।  इसी कारण इस स्थान को भविष्य बद्री के नाम से पुकारा जाता है। यहाँ का शान्त एकान्त जादुई वातावरण तीर्थयात्रियों के लिए किसी औषिधि से कम नहीं।
भविष्य बद्री  समीप फैला प्राकृतिक सौंदर्य 
चित को आकर्षित करती हिमालय की इस घाटी मे ऐसा दिव्य आलौकिक स्थान तीर्थयात्रियों एंव प्रकृति प्रेमियों के मन को असीम शान्ति प्रदान करता है। वेद ग्रन्थों के अनुसार तीर्थयात्रियो को किसी भी तीर्थस्थल पर जाकर एक रात्रि का विश्राम अवश्य करना चाहिए। किन्तु भविष्य बद्री तीर्थ मे रात्रि विश्राम की व्यवस्था न होने के कारण तीर्थयात्रियो को पुनः वापसी सलधार अथवा जोशीमठ आना पड़ता है।  


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