Thursday, 10 August 2017

 भविष्य में होगी जहाँ बद्रीविशाल की पूजा : भविष्य बद्री 


भविष्य बद्री मन्दिर 
गढ़वाल हिमालय की गगनचुंबी हिम शृंखलाओं के मध्य अनेक ऐसे तीर्थस्थल विद्यमान हैं जहाँ पहुँच पाने की अभिलाषा मानव मस्तिष्क मे चिरकाल से जन्म लेती आई है। अनादिकाल से आर्य भूमि भारतवर्ष अनेक चमत्कारों एंव अवतारों से अविभूत होती आई है। इस महान भूमि पर अनेकों ऐसे रहस्यमयी तीर्थस्थल हैं जिनकी जानकारी आम मनुष्य के लिए अभी भी विस्मय एंव आश्चर्य का विषय है। जोशीमठ के समीप ऐसा ही एक रहस्यमयी तीर्थ है भविष्यबद्री। कहा जाता है कि जोशीमठ स्थित नृसिंह भगवान मन्दिर में शालीग्राम नृसिंह भगवान्  की एक भुजा दिन प्रतिदिन पतली हो रही है। हमारे आदि देव ग्रंथों के अनुसार जब यह भुजा टूटकर मूर्ति से अलग हो जाएगी उस समय नर-नारायण पर्वतों के आपस मे जुड़ जाने से बद्रीनाथ को जाने वाला मार्ग अगम्य हो जाएगा, तब तपोवन स्थित भविष्य बद्री मे भगवान बद्री नारायण की पूजा की जायेगी। 
तपोवन 
जोशीमठ से 15 किमी. दूर मलेरी जाने वाले मार्ग पर स्थित है तपोवन। धवल ताल से निकली धोली गंगा के तट पर शांतपूर्ण वातावरण मे बसे तपोवन से पवित्र द्रोणागिरी पर्वत के दर्शन तीर्थयात्रियों को प्राप्त होते हैं। 
गर्म जल के स्रोत (तपोवन)
तपोवन मे सड़क मार्ग के किनारे ही गर्म जल के अनेक स्रोत हैं, जिनसे  निकलने वाला गर्म पानी तीर्थयात्रियों एंव सैलानियों के लिए जिज्ञासा का विषय बना हुआ है। तपोवन मे रहने के लिए छोटे-छोटे होटलों के अलावा एक ऋषिकुल आश्रम की व्यवस्था भी है,किन्तु प्रायः भविष्य बद्री की ओर जाने वाले यात्री तपोवन से 4 किमी. दूर सलधार मे बने एक आश्रम मे ही रुकना पसन्द करते हैं।
सलधार गाँव 
सलधार गाँव के बीच स्थित इस छोटे से आश्रम के समीप बिखरे अनुपम सौंदर्य का रसपान केवल भाग्यशाली व्यक्तियों को ही हो पाता है। आश्रम का शान्त एकान्त वातावरण तीर्थयात्रियों को एक अलौकिक एंव आनन्दमयी मानसिक शांति प्रदान करता है। प्राकृतिक हरियाली के बीच आश्रम के सामने अडिग ध्यानावस्थित अवस्था मे स्थित दुग्ध धवल हिम छिन्द्ति पवित्र द्रोणागिरी पर्वत की चोटी तीर्थयात्रियों का मन मोह लेती है।
 द्रोणागिरी पर्वत 
आश्रम के चारों ओर फैली हरियाली एंव प्रकृति की अछूती सुषमा निहारकर तीर्थयात्रियों का चित भाव विभोर हो जाता है। द्रोणागिरी पर्वत के आस पास बसे कई गावों मे हनुमान जी की पूजा नहीं की जाती। इन गावों के निवासियों का मानना है कि श्री राम रावण युद्ध मे लक्ष्मण जी के मूर्छित होने  पर हनुमान जी द्रोणागिरी पर्वत का एक हिस्सा ही ले गए थे। यदि उन्हे संजीवनी बूटी की आवश्यकता थी तो केवल बूटी ही ले जाते। पर्वत का एक हिस्सा ले जाने के कारण यहाँ के निवासी हनुमान जी से रुष्ट हो गए,तभी से यहाँ हनुमान जी की पूजा न करने का विधान है। आज द्रोणागिरी पर्वत का एक हिस्सा अपने स्थान पर नहीं है जोकि इस कथा को सत्य प्रमाणित करता है। सलधार से लगभग 6 किमी. की खड़ी चड़ाई द्वारा भविष्य बद्री पहुँचा जाता है। चलने मे असमर्थ यात्रियो को एक दिन पूर्व ही गाँव मे घोड़ो की व्यवस्था कर लेनी चाहिए। जिससे  अगले दिन यात्रा पर निकलने मे असुविधा ना हो। पैदल जाने वाले तीर्थयात्री लगभग 3 घंटे मे भविष्य बद्री पहुँच जाते हैं। ऊबड़ खाबड़ एंव कटीली घास वाले मार्ग से होते हुए तीर्थयात्री यात्री आगे बढ़ते हैं। यहाँ से सुभई गाँव की दूरी लगभग 4किमी. है किन्तु यहाँ से आगे का सम्पूर्ण मार्ग खड़ी चड़ाई वाला होने के कारण यात्रियो को सावधानीपूर्वक चलना पड़ता है। समुन्द्र तल से लगभग नौ हजार फीट की ऊँचाई पर घने वृक्षों के बीच बद्रीनाथ का छोटा सा मंदिर स्थित है। एक छोटे से चबूतरे पर बना यह मंदिर अपने आप मे रहस्यपूर्ण है। 
शिला पर उभरती विष्णु भगवन की मूर्ति 
मंदिर के भीतर एक शिला पर नरसिंह भगवान की शेर के धड़ वाली आकृति स्वयं ही उभर रही है। जनमान्यता के अनुसार जिस दिन ये मूर्ति सम्पूर्ण हो जाएगी तब बद्रीनाथ जाने वाला मार्ग बंद हो जाएगा जिस कारण भक्तों को बद्री विशाल की पूजा हेतू इस स्थान पर आना होगा।  इसी कारण इस स्थान को भविष्य बद्री के नाम से पुकारा जाता है। यहाँ का शान्त एकान्त जादुई वातावरण तीर्थयात्रियों के लिए किसी औषिधि से कम नहीं।
भविष्य बद्री  समीप फैला प्राकृतिक सौंदर्य 
चित को आकर्षित करती हिमालय की इस घाटी मे ऐसा दिव्य आलौकिक स्थान तीर्थयात्रियों एंव प्रकृति प्रेमियों के मन को असीम शान्ति प्रदान करता है। वेद ग्रन्थों के अनुसार तीर्थयात्रियो को किसी भी तीर्थस्थल पर जाकर एक रात्रि का विश्राम अवश्य करना चाहिए। किन्तु भविष्य बद्री तीर्थ मे रात्रि विश्राम की व्यवस्था न होने के कारण तीर्थयात्रियो को पुनः वापसी सलधार अथवा जोशीमठ आना पड़ता है।  


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